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जैव विकास


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1. चार्ल्स डार्विन विकास के सिद्धांत से सम्बन्धित हैं।
2. जीवाश्म काल- निर्धारण का एक तरीका जीवाश्म सामग्री में एक ही तत्व के विभिन्न समस्थानिकों के अनुपात का पता लगाना हैं।
3. डार्विन के विकास सिद्धांत हमें बताता हैं, कि कैसे जीवन सरल से अधिक जटिल रुपों में विकसित हुआ।
4. मनुष्यों के क्रम विकास अध्ययन इंगित करता है कि हम सभी एक ही प्रजाति से संबन्धित है, जो अफ्रीका में विकसित हुई हैं।
5. जीवों में भिन्नता से विविधता की उत्पत्ति और विकास होता हैं।
6. पुनर्जनन प्रजनन के समान नहीं हैं।
7. विभज्योतक ऊतक एक विशेष भूमिका निभाते हैं और अपनी विभाजित करने की क्षमता को त्याग देते हैं एवं तब स्थायी ऊतक बनाते हैं।
8. हाल्डेन ने सुझाव दिया था कि जीवन सरल अकार्बनिक ( अजैवी) अणुओं से विकसित हुआ हैं।
9. अधिकांश सरीसृपों में एक तीन-कक्षीय ह्रदय होता हैं।
10. ओरजिन ऑफ स्पीशीज ( प्रजाति की उत्पत्ति) नामक पुस्तक चार्ल्स डार्विन ने लिखी थी।
11. जीन के अचानक परिवर्तन को जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुक्रमता रखती हो, उसे उत्परिवर्तन( Mutation) कहते हैं।

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12. लैमार्क( Lamarck) थियोरी ऑफ इंहेरिटेंस ऑफ एक्वायर्ड करेक्टर ( Theory of inheritance of Acquired Characters ) से सम्बद्ध हैं।
13.प्राकृतिक चयन का सिद्धांत ( Theory of Natural Selection) चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन ( Charles Robert Darwin) प्रस्तावित किया था।
14. डायनासोर, सरीसृप वर्ग का प्राणी था जो कि ट्राइएजिक समय में पैदा हुए और क्रिटेशियस युग में विलुप्त हो गए।
15. डायनासोर करोड़ो वर्षों तक पृथ्वी के सबसे प्रमुख स्थलीय कशेरुकी जीव थे।
16. असम और नागालैण्ड के पहाड़ी वनों में पाया जाने वाला भारत का एकमात्र कपि गिब्बन ( Gibbon) है।

जीवाणु , विषाणु, लाइकेन तथा कवक

17. प्लाज्मोडियम एक प्रोटोजोआ संघ का प्राणी हैं।
प्लाज्मोडियम की कुछ जातियों को मलेरिया परजीवी भी कहते हैं, क्योंकि ये मनुष्य में मलेरिया रोग उत्पन्न करती हैं।
18.लिटमस विलयन एक बैंगनी डाई हैं, जिसे काई ( लाइकेन) से निकाला जाता हैं।
19. स्पाइरोगाइरा विखंडन द्वारा उत्पन्न किए जा सकते हैं।
20. शूलचर्मी ( इकाइनोडर्मेटा) संघ के प्राणी अनन्य रुप से समुद्र में मुक्त जीवन जीने वाले प्राणी हैं।
21. फाइलम इकाइनोडर्मेटा विशेष रुप से समुद्री जीवों में पाया जाता हैं 22. जीवाणुं, नाइट्रोजन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
23. जीवाणु द्वारा होने वाले रोग टिटनेस, हैजा, टॉयफाइड, तपेदिक डिप्थीरियाप्लेगएंव कुष्ठ हैं।

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24. विषाणु द्वारा होने वाले रोग एड्स, डेंगू,पोलियो, इन्फ्लुएंजा, चेचक इत्यादि हैं।
25. फफूंद द्वारा होने वाले रोग एथलीटफुट, खाज ,गंजापन ,दाद इत्यादी हैं।
26. एड्स का विषाणु रक्त में T-कोशिका की वृद्धि को प्रभावित करता हैं।
27. दंत क्षय का कारण बैक्टीरिया जनित संक्रमण हैं।
28. वायरस सजीव और निर्जीव पदार्थों के बीच की कड़ी है।
29. बैसिलस थुरिजिएंसिस एक बैक्टीरिया हैं, जिसका उपयोग जैविक कीटनाशी के रुप में होता हैं।
30. प्रथम एंटीबायॉयोटिक (पेनिसिलिन) की खोज वर्ष 1929 में सर अलेक्जेन्डर फ्लेंमिग द्वारा किया गया।
31. पेनिसिलिन का उपयोग कवक( फफूंद) द्वारा उत्पन्न रोगों के इलाज के लिए किया जाता हैं।
32. पीत ज्वर एक वायरस के संक्रमण से होता हैं, जो एडीज मच्छर द्वारा फैलता हैं।
33. पोलियो वायरस से बचाव के लिए पोलियो वैक्सीन का विकास सर्वप्रथम जोनास साल्क द्वारा किया गया तथा इसका परीक्षण वर्ष 1952 में किया गया।
34. मुख से लिए जाने वाले पोलियो वैक्सीन ( Oral Vaccine) का विकास अल्बर्ट साबिन द्वारा किया गया।
35. प्लेग चूहों के शरीर में पाए जाने वाले पिस्सू के माध्यम से फैलता हैं।
यह एक संक्रामक रोग होता हैं।
36. प्लेग से पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में रहने से यह रोग दूसरों को भी हो जाता हैं।
37. एड्स ( एक्वॉयर्ड इम्यूनो-डिफिशिएंसी सिंड्रोम) एक रिट्रोवायरल रोग हैं जिससें व्यक्ति का प्रतिरक्षी तंत्र कमजोर हो जाता हैं।
38. एड्स की पहचान वर्ष 1981 में सर्वप्रथम सं. रा. अमेरिका में की गई थी।
39. एड्स समलिंगी और इतरलिंगी यौन संपर्क , रक्ताधान इत्यादी द्वारा फैलता हैं।
40. AIDS की जांच के लिए एलिसा ( Enzyme-Linked Immunosorbent Assay- ELISA) परिक्षण किया जाता हैं।
41. एजीडोथाइमिडिन ( जीडोवुडिन) एक प्रकार की एंटी रेट्रोवायरल दवा है, जिसे HIV/ AIDS के उपचार में प्रयोग किया जाता हैं।
42. एड्स संक्रमित यौन संबंधो के कारण, संक्रमित रुधिराधान से तथा संक्रमित माता से शिशुओं में व स्तनपान से फैलता हैं।
43. हाथ मिलाने , गले लगाना , तथा साथ रहना व खाना एड्स के संचरण का माध्यम नहीं हैं।
44. बेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट HIV संक्रमण का एक परीक्षण हैं।
45. दाद की बीमारी ट्राइकोफाइटॉन तथा माइक्रोस्पोरम नामक कवक से होती हैं।
46. डिप्थीरिया एक संक्रामक रोग हैं।
47. रोहिणी ( गलाघोंटू या डिप्थीरिया )जीवाणु द्वारा फैलता हैं।
48. रोहिणी गले की एक बीमारी हैं, जबकि इन्फ्लूएंजा एक वायरस के द्वारा फैलता है जिसे इन्फ्लूएंजा वायरस कहते हैं।
49. पीलिया रोग में रुधिर में पित्तरंजक ( Bilirubin) की मात्रा बढ़ जाने से श्लैष्मिक झिल्ली तथा त्वचा का रंग पीला हो जाता हैं।
50. चिकन पॉक्स विषाणु के काऱण होता हैं।
51. जीवाणु सड़े-गलें मृत अवशेषों का क्षय करते हैं तथा भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं।
दूध से दही बनने तथा सिरका बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान हैं।
52. दूध को इस्तेमाल करने से पहले हम इसें सूक्ष्म जीवों को मारने के लिए उबालते हैं।
53. दूध के दही रुप में जमने का कारण लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु होता हैं।
54. चमड़े के जूतों पर वर्षा ऋतु में कई बार हरे रंग का रोयेदांर पदार्थ जम जाता हैं, यदि जूतें की देखभाल न हों।
यह कवक की वृद्धि के कारण होता हैं।
55. पृथ्वी पर पाई जाने वाली सूक्ष्मतम वनस्पति एल्गी हैं।
56. पोरीफेरा जीवाणु नहीं हैं, यह एक संघ ( Phylum) हैं।
57. राइजोबियम, क्लॉस्ट्रिडियम , एजोटोबैक्टर, पेनिसिलिन में से पेनिसिलिन वायुंमण्डलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर नहीं कर सकता हैं।
58. कवक ( Fungi) को पोषण मृत और क्षय हो रहे जैव पदार्थों से मिलता हैं।
59. यीस्ट ( खमीर) में जनन कली निकलने ( Budding) के माध्यम से होता हैं।
60. विषाणु परपोषी जीव की कोशिकाओं के अंदर ही पुनरुत्पादन करता हैं।
61. रिंडरपेस्ट रोग को पशुओं का महामारी रोग कहा जाता हैं 62. यह फटे हुए खुर वाले पशु में जैसे गाय, भैस, बकरी और जुगाली करने वाले दूसरें पशुओं में होने वाला एक भयानक संक्रामक रोग हैं।
63. बैक्टीरिया के द्वारा नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिक में परिवर्तित करने की प्रक्रिया नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहलाती हैं।
64. बैक्टीरिया के विरुद्ध एंटिबायोटिक बैक्टीरिया के लिए आवश्यक जैव- रासायनिक मार्गों को अवरुद्ध कर देता हैं।
65. सर्पिल आकार के बैक्टीरिया को स्पाइरिलिम( Spirillum) कहते हैं।